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Sunday, August 10, 2008

इन नारियों की भी चिंता करो

दिल्ली में लगभग २००.००० ऐसी महिला मजदूर हैं जो दूसरे शहरों से आई हैं और कंस्ट्रक्शन साइट्स पर काम करती हैं. यह महिलायें रोजगार की तलाश में दिल्ली आती है और अमानवीय परिस्थितियों में रहने के लिए विवश हैं. इन की दयनीय स्थिति के बारे में जानने के लिए नीचे दी गई लिंक पर क्लिक करें.

Sorry state of Delhi's women labourers

मैंने इंटरनेट से कुछ तस्वीरें ली हैं जो यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ. यह तस्वीरें ख़ुद ही सब कुछ कह रही हैं.


























































दिल्ली में मादीपुर नाले के किनारे यह महिलाएं अपने परिवार के साथ रह रही हैं।

आज कल ब्लाग्स पर नारी प्रगति के बारे में बहुत कुछ लिखा जा रहा है. पर इन मजदूर महिलाओं के हालात सुधारे बिना नारी प्रगति की बात करना मुझे एक अपराध सा लगता है. मैंने कई बार यह बात इन ब्लाग्स पर उठाई है पर कोई इस बात का नोटिस ही नहीं लेता. कितना दुर्भाग्यपूर्ण है यह.

5 comments:

संगीता पुरी said...

इन नारियों की चिंता कौन करेगा , सभी आज अपनी.अपनी चिंता में लगे हैं। भगवान ही बतला सकते हैं ,कब इनकी स्थिति सुधरेगी ?

राज भाटिय़ा said...

सुरेश जी , आप भी ना,अजी वो तो दुसरो के बसे बसाये घर उजाडने के लिय्र लिखा जाता हे,अब आप ही देखिये ना जब तक शादी ही नही होती तो हमे क्या पता शादी के बाद का सुख,पत्नि क्या होती हे, पति कया होता हे, परिवार क्या होता हे,ओर आजादी क्या होती हे,आप के हर लेख से मे बहुत प्रभावित होता हु,
इन मजदूर महिलाओं के हालात सुधारे बिना नारी प्रगति की बात करना मुझे एक अपराध सा लगता है.इस के अलावा जो महिलाये मजबुरी मे जिस्म फ़रोसी का काम करती हे उन्हे भी तो उस नरक से यही, निकाले ......

Suresh Chandra Gupta said...

संगीता जी, आप की बात बिल्कुल सही है. सब अपनी चिंता में लगे हैं. मैं जब भी यह बात नारियों द्बारा चलाये जा रहे ब्लाग्स पर उठाता हूँ, उनकी भाषा तीखी हो जाती है.

राज जी आप सही कह रहे हैं. शादी ही क्या, हर सामजिक व्यवस्था पर आक्रमण हो रहे हैं.

Advocate Rashmi saurana said...

Sangeeta ji thik kah rhi hai. pahale log apni cinta to kar le. bhut dukh hua ye jankar.

क्रष्ण said...

कुछ शिक्षित नारियां समझती हैं कि वह पूरे नारी वर्ग का प्रतिनिधित्व करती हैं और यह प्रतिनिधित्व केवल समाज और पुरूष वर्ग को गालियाँ देकर ही हो सकता है. मैं भी नारी प्रगति का समर्थक हूँ पर इन नारियों की गाली-गलौज से हतोत्साहित हो जाता हूँ.
क्रष्ण